मर्दाना कमज़ोरी: कम उम्र में यह परेशानी जो कोई नहीं बताता

एक बार हुआ था। सोचा था एक बार की बात है। फिर दूसरी बार हुआ। अब कई हफ्ते हो गए हैं। Google पर सर्च किया, इतिहास डिलीट किया, फिर सर्च किया। किसी से बात नहीं की। किसी को नहीं बताया।
यह पढ़ रहे हैं, तो जानते हैं यह किस बारे में है। और यह भी लग रहा है कि इस परेशानी में अकेले हैं। लेकिन यह सच नहीं है।
मर्दाना कमज़ोरी यानी वक्त पर शरीर का साथ न देना — यह 20 से 35 साल के नौजवानों में भी होती है। बड़ी उम्र की बीमारी नहीं है यह। और भारत में इस पर लगभग कोई बात नहीं होती, जिसकी वजह से यह परेशानी अकेले में बढ़ती रहती है।
मर्दाना कमज़ोरी है क्या असल में?
जब बार-बार ऐसा हो कि शरीर ठीक से साथ न दे, और यह किसी एक मौके की बात न हो बल्कि एक सिलसिला बन जाए, तो इसे मर्दाना कमज़ोरी कहते हैं। एक बार तनाव, थकान या शराब की वजह से ऐसा हो जाए, वो अलग बात है। लेकिन जब यह बार-बार हो और कोई साफ बाहरी वजह न दिखे, तो यह समझना ज़रूरी है कि आखिर क्यों हो रहा है।
2025 में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक 40 साल से कम उम्र के 35 प्रतिशत तक पुरुषों में यह परेशानी देखी जाती है। भारत में, जहां इस विषय पर खुलकर बात लगभग होती ही नहीं, यह संख्या और भी ज़्यादा हो सकती है।
कम उम्र के नौजवानों में यह क्यों होती है?
ज़्यादातर मामलों में, खासकर कम उम्र के पुरुषों में, इसकी सबसे बड़ी वजह मानसिक होती है, शारीरिक नहीं।
मानसिक डर का चक्र कुछ ऐसे काम करता है। एक बार शरीर ने साथ नहीं दिया। अगली बार उसी डर से मन घबरा जाता है। घबराहट तंत्रिका तंत्र को उस संकेत से दूर कर देती है जो शरीर को तैयार करता है। नतीजा फिर वही होता है। और इस बार डर और बढ़ जाता है। यह चक्र एक बार शुरू हो जाए तो खुद से तोड़ना बहुत मुश्किल होता है।
लगातार तनाव दूसरी बड़ी वजह है। जब हम लंबे समय तक तनाव में रहते हैं, शरीर में कोर्टिसोल नाम का हॉर्मोन बढ़ता है। कोर्टिसोल सीधे टेस्टोस्टेरोन को कम करता है। और जब टेस्टोस्टेरोन कम होता है तो शारीरिक इच्छा और क्षमता दोनों प्रभावित होती हैं। ऑफिस का प्रेशर, पैसों की चिंता, परिवार की उम्मीदें — यह सब सिर्फ दिमाग को नहीं, शरीर को भी थकाते हैं।
नींद की कमी एक ऐसी वजह है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। टेस्टोस्टेरोन का ज़्यादातर उत्पादन रात को गहरी नींद के दौरान होता है। जो लोग रोज़ाना छह घंटे से कम सोते हैं, या जिनकी नींद रात को देर तक मोबाइल देखने या तनाव की वजह से टूटती रहती है, उनमें टेस्टोस्टेरोन का स्तर स्वाभाविक रूप से कम होता जाता है।
बैठे रहना, खराब खान-पान, डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां जो अब युवाओं में भी बढ़ रही हैं — ये शारीरिक कारणों में आते हैं। कभी-कभी मर्दाना कमज़ोरी इन बीमारियों का पहला संकेत होती है जो बाकी लक्षणों से पहले सामने आती है
भारत में यह सब छुपाने की असली वजह?
भारत में इस परेशानी के बारे में बात करना बहुत मुश्किल है। दोस्तों से नहीं होती यह बात। परिवार में तो बिल्कुल नहीं। डॉक्टर के पास जाने में भी झिझक होती है। इसकी वजह यह है कि हमारे समाज में मर्दाना ताकत को मर्दानगी से जोड़ा जाता है। जब शरीर साथ नहीं देता, तो इसे कमज़ोरी या नाकामी की तरह देखा जाने लगता है। यह सोच गलत है, लेकिन यह है।
PMC में छपी एक रिसर्च बताती है कि भारत में मर्दाना कमज़ोरी की सबसे ज़्यादा कम रिपोर्टिंग इसलिए होती है क्योंकि पुरुष समाज के डर से इसे छुपाते हैं। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि जो परेशानी शुरुआत में आसानी से ठीक हो सकती थी, वो महीनों और कभी-कभी सालों तक चलती रहती है।
यह ध्यान देने वाली बात है: डर और चिंता खुद भी मर्दाना कमज़ोरी की एक बड़ी वजह हैं। जितना छुपाते हैं, जितना अकेले रहते हैं इस डर के साथ, परेशानी उतनी बढ़ती है। यह सिर्फ भावनात्मक बोझ नहीं है। यह एक clinical cycle है।
क्या किया जा सकता है?
अगर यह मुख्यतः मानसिक वजह से है यानी डर का चक्र है, तो उसे तोड़ना सबसे पहला कदम है। इसके लिए एक trained काउंसलर या मनोचिकित्सक से बात करना सबसे असरदार तरीका है। जिस तरह पेट दर्द के लिए डॉक्टर के पास जाते हैं, उसी तरह मानसिक कारणों के लिए विशेषज्ञ से मिलते हैं। इसमें शर्म की कोई बात नहीं।
जीवनशैली में बदलाव का असर सीधा और शोध में साबित हुआ है। रोज़ाना 30 से 40 मिनट की aerobic exercise खून का दौरा बेहतर करती है और इसका सीधा असर शारीरिक कार्यक्षमता पर पड़ता है। नींद 7 से 8 घंटे हो तो टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन सामान्य रहता है। शराब और धूम्रपान कम करना, खाना ठीक करना — इन सबसे दो से तीन महीने में फर्क दिखता है।
अगर डायबिटीज़ या टेस्टोस्टेरोन की कमी जैसी कोई शारीरिक वजह है, तो डॉक्टर उसे ठीक करते हैं और इस परेशानी में अपने आप सुधार आता है।
डॉक्टर की सलाह पर ली जाने वाली दवाएं भी हैं जो असरदार और सुरक्षित हैं। ये बैसाखी नहीं हैं बल्कि एक उपाय हैं जो तब तक काम करते हैं जब तक बाकी वजहें ठीक हो रही हों। इनका इस्तेमाल करना कोई हार नहीं है।
डॉक्टर से कब मिलें?
अगर चार से छह हफ्ते से यह सिलसिला चल रहा है, अगर रिश्ते पर असर पड़ रहा है, अगर मन में बहुत ज़्यादा चिंता और बेचैनी रहती है, अगर नींद और थकान की लगातार दिक्कत है, या अगर डायबिटीज़ या हाई ब्लड प्रेशर जैसी कोई बीमारी है, तो डॉक्टर से मिलना ज़रूरी है। याद रखें — यह एक इलाज होने वाली चिकित्सा स्थिति है।
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चिकित्सा अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी इलाज से पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह लें।
