8 मई 2026The SabaiHealth TeamThe SabaiHealth Teamहिंदी

महावारी में इतना दर्द क्यों होता है? जो सब नॉर्मल बताते हैं, वो नहीं है

महावारी में इतना दर्द क्यों होता है? जो सब नॉर्मल बताते हैं, वो नहीं है

हर महीने वही होता है। दो दिन पहले से अंदाज़ा हो जाता है। पेट में भारीपन आने लगता है। काम रोकना पड़ता है, जाने का प्लान कैंसिल होता है। पहले दिन तो बिस्तर से उठना भी मुश्किल हो जाता है। दर्द की दवाएं पर्स में हैं, मेज़ पर हैं, बाथरूम में हैं। और हर बार जब किसी से बात की, यही सुना: सबको होता है। सह लो।

लेकिन सबको होता है और यह ठीक है, इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है।

भारत में 60 से 80 प्रतिशत महिलाओं को महावारी में दर्द होता है। लेकिन यह आंकड़ा सिर्फ यह बताता है कि यह परेशानी कितनी आम है। यह नहीं बताता कि इसे बिना समझे सहना सही है। और यह तो बिल्कुल नहीं बताता कि कुछ मामलों में यह दर्द एक गहरी बीमारी का संकेत है जिसे पहचानने में बरसों लग जाते हैं।

महावारी का दर्द होता क्यों है?

दर्द को समझने के लिए पहले यह जानना ज़रूरी है कि शरीर में असल में होता क्या है।

महावारी के दौरान गर्भाशय प्रोस्टाग्लैंडिन नाम के रासायनिक यौगिक बनाता है। इनका काम है गर्भाशय को सिकोड़ना ताकि उसकी परत बाहर निकल सके। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन कुछ महिलाओं के शरीर में यह प्रोस्टाग्लैंडिन ज़रूरत से बहुत ज़्यादा बनता है। जितना ज़्यादा बनता है, उतनी ज़्यादा ताकत से गर्भाशय सिकुड़ता है। और यही असहनीय ऐंठन, कमर दर्द और जी मिचलाने की वजह है। इसे primary dysmenorrhea कहते हैं, यानी ऐसा दर्द जिसके पीछे कोई और बीमारी नहीं है।

लेकिन एक दूसरी तरह का दर्द भी होता है जिसे secondary dysmenorrhea कहते हैं। इसमें दर्द की असली वजह कोई और बीमारी होती है जैसे endometriosis, PCOS, adenomyosis, या uterus में fibroids। इस दर्द को सिर्फ दर्द की दवा से दबाते रहने से कुछ नहीं होता क्योंकि जड़ में बैठी बीमारी वैसी ही रहती है।

और भारत में केवल 14.2 प्रतिशत महिलाएं जिन्हें यह दर्द होता है, कभी डॉक्टर से मिलती हैं। बाकी सब दवा लेकर सह लेती हैं, अक्सर यह जाने बिना कि उनका दर्द दोनों में से कौन से तरह का है।

दोनों तरह के दर्द में फर्क कैसे पहचानें?

यह पहचानना ज़रूरी है क्योंकि इलाज बिल्कुल अलग होता है।

पहले तरह का दर्द आमतौर पर पहले पीरियड के कुछ साल बाद शुरू होता है। यह पीरियड के पहले दिन के साथ आता है और एक-दो दिन में कम हो जाता है। ibuprofen या mefenamic acid जैसी दवाएं जल्दी ली जाएं तो असर करती हैं। और उम्र के साथ या बच्चे होने के बाद यह अक्सर बेहतर होता है।

दूसरे तरह के दर्द का पैटर्न बिल्कुल अलग होता है। यह साल-दर-साल बढ़ता है, कम नहीं होता। यह पीरियड शुरू होने से पहले भी होता है। शारीरिक संबंध के दौरान या बाद में दर्द देता है। शौचालय जाने में पीरियड के दिनों में दर्द होता है। और पहले जो दवाएं काम करती थीं, वो अब नहीं करतीं। अगर आपका दर्द इन संकेतों में से किसी में भी आता है, तो यह सहते रहने की नहीं, जांच करवाने की ज़रूरत है।

यह किस बीमारी का संकेत हो सकता है?

Endometriosis एक ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भाशय की भीतरी परत जैसी tissue बाहर उगने लगती है, अक्सर अंडाशय और आसपास के हिस्सों में। यह tissue भी हर महीने उसी तरह फूलती-सिकुड़ती है जैसे अंदर की परत। लेकिन बाहर होने की वजह से खून निकलने की जगह नहीं है, तो यह अंदर ही सूजन बनाती है। इससे बहुत तेज़ दर्द होता है। भारत में इस बीमारी की पहचान होने में औसतन सात से दस साल लग जाते हैं क्योंकि हर बार डॉक्टर के पास जाओ, हर बार यही सुनो: यह normal है।

PCOS का असर पीरियड के दर्द पर भी होता है। PCOS में हॉर्मोन का असंतुलन गर्भाशय में संकुचन ज़्यादा तेज़ बनाता है। जिन महिलाओं के पीरियड अनियमित हैं और जब आते हैं तो बहुत दर्दनाक होते हैं, साथ में वज़न बढ़ना या अनचाहे बाल हैं, उनमें PCOS की जांच ज़रूरी है।

Adenomyosis में गर्भाशय की भीतरी परत उसकी मांसपेशियों में उगने लगती है। इससे गर्भाशय भारी और बड़ा होता है और बहुत दर्दनाक, बहुत ज़्यादा bleeding वाले पीरियड होते हैं जो उम्र के साथ बिगड़ते जाते हैं। 30 से 40 की उम्र की महिलाओं में यह ज़्यादा देखी जाती है और इस पर बहुत कम बात होती है।

क्या करने से दर्द कम होता है?

पहले तरह के दर्द के लिए कुछ तरीके असरदार हैं।

सबसे ज़रूरी बात है दवाई जल्दी लेना। Ibuprofen और mefenamic acid तब सबसे अच्छा काम करती हैं जब दर्द शुरू होने से पहले या एकदम शुरुआत में ली जाएं। जब दर्द बहुत बढ़ जाए तब लेने से दवा उतना असर नहीं करती — क्योंकि तब तक प्रोस्टाग्लैंडिन बड़ी मात्रा में बन चुका होता है और गर्भाशय संकुचन में है।

गर्म सेंक भी सच में काम करता है। पेट के निचले हिस्से पर गर्म पानी की बोतल या गर्म तौलिया रखने से नसें ढीली होती हैं और ऐंठन में राहत मिलती है। यह शोध में साबित हो चुका है।

पूरे महीने हल्की कसरत करना, सिर्फ पीरियड के दिनों में नहीं, प्रोस्टाग्लैंडिन की तीव्रता को कम करता है। जो महिलाएं नियमित रूप से physically active रहती हैं उनमें महावारी का दर्द कम गंभीर होता है।

खाने में तला-भुना, बहुत मीठा और processed food कम करना शरीर में सूजन कम करता है जो पीरियड दर्द को और बढ़ाती है।

दूसरे तरह के दर्द के लिए ये तरीके थोड़ी राहत दे सकते हैं लेकिन जड़ की बीमारी का इलाज नहीं होगा। वहां डॉक्टर की ज़रूरत है।

डॉक्टर के पास कब जाएं?

इनमें से कोई भी हो तो अब और रुकना सही नहीं है। पहले दिन काम करना असंभव हो जाता है। हर महीने दर्द बढ़ता जा रहा है, कम नहीं हो रहा। जो दवाएं पहले काम करती थीं अब नहीं करतीं। शारीरिक संबंध के दौरान या बाद में दर्द होता है। शौचालय जाने में पीरियड के दिनों में दर्द होता है। या बच्चे होने में दिक्कत आ रही है।

ये सब बातें कुछ निश्चित रूप से गलत होने का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन ये सब जांच करवाने का कारण ज़रूर हैं। एक ultrasound या साधारण जांच बहुत सारी चीज़ें साफ कर देती है। आपने कई महीने सह लिया। एक डॉक्टर का appointment उतने वक्त में हो जाता है जितना एक बुरे पीरियड का दिन।

Sabai: जो आपका हर महीने का दर्द याद रखता है?

महावारी के दर्द में सबसे बड़ी दिक्कत जानकारी की कमी नहीं है। दिक्कत यह है कि कोई नहीं है जो आपका पिछला दर्द याद रखे, देखे कि हर महीने बढ़ रहा है या कम हो रहा है, और सही वक्त पर कहे कि अब यह डॉक्टर के पास जाने का मामला है।

Sabai यह करता है। आपके पीरियड का पैटर्न याद रहता है, दर्द की तीव्रता track होती है, और Sabai बताता है कि यह पहले तरह का दर्द लग रहा है या कुछ और जांचना चाहिए।

अगर आप सबको होता है सुनते-सुनते थक गई हैं और समझना चाहती हैं कि असल में क्या हो रहा है, तो आज Sabai से बात करें। WhatsApp, LINE और Telegram पर बिल्कुल मुफ्त।

चिकित्सा अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी इलाज से पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह लें।
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